पंजाब में राजनीतिक समीकरण पर बरी होने का सीमित असर, स्थानीय मुद्दे रहेंगे निर्णायक

दिल्ली की अदालत ने शुक्रवार को शराब नीति घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 21 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने सीबीआई के आरोपपत्र में कई खामियों और सबूतों की कमी को देखते हुए इस पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने कहा कि आरोपपत्र में आंतरिक विरोधाभास हैं और किसी भी ठोस सबूत के अभाव में आरोप टिक नहीं सकते। अदालत ने कहा कि यह कानून के शासन के खिलाफ था और नेताओं को बिना सबूत फंसाया गया।
पंजाब चुनाव पर असर के सवाल
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की बरी होने की खबर के बाद राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसका असर 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने कहा कि आम आदमी पार्टी के नेताओं को बधाई देते हैं, लेकिन सवाल बीजेपी पर है कि आखिर क्यों ऐसा हुआ। वडिंग ने कहा कि जिन आरोपियों को गंभीर अपराधों में लंबे समय तक हिरासत में रखा गया, उनके खिलाफ भी केस टिक नहीं पाए, तो यह मामले में न्याय की प्रक्रिया पर सवाल उठाता है।

पंजाब में स्थानीय मुद्दों का प्रभाव
वडिंग ने स्पष्ट किया कि इस बरी होने से पंजाब के राजनीतिक माहौल पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि पंजाब की राजनीति में असली मुद्दे राज्य के विकास, कानून व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़े हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार को अपने कार्यकाल और कामकाज को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना होगा। उन्होंने कहा कि चुनाव में जनता अपने अनुभव और राज्य से जुड़े मुद्दों के आधार पर निर्णय लेगी, इसलिए केवल बरी होने की घटना का चुनावी प्रभाव सीमित रहेगा।
अदालत की टिप्पणियां और सीबीआई की जांच
अदालत ने कहा कि केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे और सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता। न्यायाधीश ने आरोपपत्र में कई भ्रामक कथनों और कमियों को उजागर किया। अदालत ने कहा कि आरोपपत्र में साजिश की थ्योरी की नींव कमजोर है और गवाहों या सबूतों द्वारा इसकी पुष्टि नहीं होती। सीबीआई की जांच पर भी फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा कि संघीय एजेंसी ने उचित सावधानी और प्रमाण जुटाने में लापरवाही बरती।